Monday, February 20, 2012

सफल लोगों के बारे में एक असफल आदमी की कविता

मेरे आसपास कई सफल लोग हैं

अपनी शोहरत के गुमान में डूबे हुए।
जब भी उन्हें कोई पहचान लेता है
वे खुश हो जाते हैं
और अक्सर ऐसे मौकों पर अतिरिक्त विनयशील भी
जैसे जताते हुए कि उन्हें तो मालूम भी नहीं था कि वे इतने सफल और प्रसिद्ध हैं
और बताते हुए कि उन्हें तो मालूम भी नहीं है कैसे आती है सफलता और कैसे मिलती है प्रसिद्धि।
उनके चेहरों पर होती है थोड़ी सी तृप्त और मासूम मुस्कुराहट
और साथ में हाथ झटकते हुए वे कभी-कभी मान भी बैठते हैं
कि जो भी मिला संयोग से मिला, वरना उन जैसे काबिल लोग और भी हैं
कुछ तो उनसे भी काबिल, जो उनके साथ बैठकर कभी अपनी कलम और कभी अपनी कुंठा घिसते हैं।
इस अर्द्धसत्य में झूठ की मिलावट बस इतनी होती है
कि जिसे वे संयोग बताते हैं, उसे संभव करने के लिए उन्होंने जो कुछ किया
उसे वे छुपा ले जाते हैं।

सच है कि उनको देखकर थोड़ी सी हैरानी होती है,
थोड़ा सा अफ़सोस भी और थोड़ी सी कुंठा भी।
कभी-कभी लगता है, किस्मत उन पर ज़्यादा मेहरबान रही
कि उन्हें वह सब मिलता गया, जिसकी कामना दूसरे करते हैं।
कभी-कभी लगता है, जब मांगने, हासिल करने या छीनने का वक्त आया
तो ज़ुबान तालू से चिपक गई, आंख नीची हो गई, हाथों ने हिलने से इऩकार कर दिया।

हकीकत जो भी हो, एक बात समझ में आई
कि सफलता ऐसे ही नहीं मिलती है,
उसके कुछ छोड़ना भी पड़ता है, कुछ छीनना भी।
पहले अपने-आप को सफलता के लिए सुपात्र बनाना पड़ता है
जिसमें उचित जगह पर रिरियाने की, उचित जगह पर हंसने की, उचित जगह पर तारीफ़ करने की, उचित जगह पर निंदा करने की, उचित जगह पर चीखने की भी समझ और आदत विकसित करनी पड़ती है
जिसमें शुरू में तकलीफ होती है, लेकिन बाद में सब ठीक हो जाता है।
सफलता की गर्द धीरे-धीरे दिल के बोझ से ज़्यादा वज़नदार हो जाती है
और आदमी को हलका-हलका लगने लगता है।
फिर एक बार आप सफल हो गए तो आगे सफलता आपको बनाती है
कुंठित लोग पीछे छूट जाते हैं
अपनी असफलताओं के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते
ख़ुद के न बदलने की मायूसी के मारे
और ऐसी कविताएं लिखते हुए, जिनमें नाकामी के लिए तर्क तलाशे जाते हैं।

लेकिन मेरे पास कोई तर्क नहीं है
इस फर्क के सिवा कि लिखने और बोलने से पहले आसपास देखने और तोलने का अभ्यास कभी बन नहीं पाया।



Sunday, October 23, 2011

कभी-कभी मां की याद


जब भी 65 पार की किसी महिला को देखता हूं
तो ख़याल आता है कि मां अगर जीवित होती तो इसी उम्र की होती
फिर कल्पना करता हूं, कैसी वह लग रही होती।
उसके वे बाल पूरी तरह पक गए होते
जिनके किनारों पर सफ़ेदी देखकर
आख़िरी तीन-चार वर्षों तक वह हंसा करती थी।
उसकी पीठ शायद कुछ झुक गई होती
जिसे तान कर बैठने की वह हमको कभी नसीहत दिया करती थी
और कभी अभ्यास कराया करती थी
उसकी आवाज़ में शायद उम्र की कुछ सांसें दाखिल हो गई होतीं।

वह एक पूरी तरह बूढ़ी महिला होती
जो अपनी ममता का ख़जाना अब अपने दो बेटों और एक बेटी
के बेटे-बेटियों पर लुटाया करती-
हालांकि पता नहीं, बहुओं से उसके कैसे रिश्ते होते
और उसकी उपस्थिति में यही बहुएं होतीं भी या नहीं
क्योंकि हममें किसी की शादी देख या तय कर पाने से पहले ही
वह जा चुकी थी।

नहीं, यह मेरे लिए अफ़सोस का विषय नहीं है
कि वह यह सब देखे बिना चली गई।
आख़िर हममें से कोई भी अमृत पीकर नहीं आया है
और हर किसी को किसी न किसी दिन जाना है,
और अब तक के अपने अनुभव से मैं जानने लगा हूं
कि किसी की भी सारी इच्छाएं एक उम्र में पूरी नहीं होतीं
और अगर हो जाती हैं तो उनके भीतर नई इच्छाएं पैदा होने लगती हैं.
जबकि मां तो इतनी सारी इच्छाओं वाली थी भी नहीं,
इसलिए फिर दुहराता हूं
उसका जाना मेरे लिए शोक का विषय हो तो भी उसे सार्वजनिक करने के लिए
मैं इन पंक्तियों का सहारा नहीं ले रहा
बावजूद इसके कि वह काफी पहले चली गई
बावजूद इसके कि उसके जाने के बाद हम सबने ऐसा खालीपन महसूस किया
जिसे भरा नहीं जा सका
जैसे वह धुरी ही टूट गई जिस पर हर हमारा वह पूरा परिवार टिका था
जो उसके बाद जैसे बिखरता चला गया।
नहीं, मैं इस शोक के ज्ञापन के लिए भी यहां नहीं हूं।
मैं तो उस शोक के पार जाने की कोशिश कर रहा हूं
जो मां की मृत्यु ने और इससे पैदा हुए सन्नाटे
ने हम सबके भीतर पैदा किया था।

ऐसा नहीं कि किसी भी बूढ़ी महिला को देखकर मुझे अपनी मां याद आती हो।
ऐसा भी नहीं कि हमेशा उसकी याद आती रहती हो
उसके गुज़रने के बाद अब तक के 17 साल में
बस कुछ कातर और आत्मीय लम्हे रहे होंगे जब वह मुझे शिद्दत से याद आई
और
कुछ रातों के सिहरते हुए कोमल सपने
जहां कभी वह मेरे बाल सहलाती, मेरे साथ घूमती या बात करती या मेरी फिक्र करती मिली।
लेकिन वह नहीं है,
वह धीरे-धीरे जीवन से दूर चली गई
जैसे किसी सीधी पगडंडी पर आगे बढ़ता या पीछे लौटता मुसाफिर
धुंधला होता-होता अदृश्य हो जाए।
हालांकि यह रूपक इस आशय से मेल नहीं खाता
क्योंकि पीछे वह छूटती चली गई,
आगे हम बढ़ते चले गए।
हमारे भीतर की खाली जगहें भरती चली गईं
या मरती चली गईं।
यह सब सोचकर कुछ उदासी होती है
मन कभी-कभी भर आता है
कि कितना निर्मम होता है जीवन।
पीछे छूट गए लोगों के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता।
हम फिर हंसते हैं, फिर खेलते हैं, फिर से जीने लगते हैं
और कभी-कभी उदास भी हो जाते हैं
लेकिन स्मृति और उदासी के गलियारों में टहलना भी
जीवन का उल्लास ही है-
जो नहीं हैं, उनके अब तक होने की कामना
और यह कल्पना कि वे कैसे लगते अगर अब भी होते।

मेरे लिए इस कल्पना का मोल हो तो हो
लेकिन मेरी उस मां के लिए क्या,
जिसे न कोई कल्पना छूती होगी
न कोई दुख व्यापता होगा
वह तो स्मृति और जीवन के पार
न जाने किस अकल्प अछोर अंधकार में
हमेशा-हमेशा के लिए गुम हो गई है।
वह नहीं लौटेगी, जानता हूं।
बस उसे अपने भीतर बचाए रखना चाहता हूं
उसके लिए नहीं, अपने लिए
जिसे इस लगातार अजनबी होते संसार में
चाहिए एक अपना।
वह यों ही याद नहीं आ जाती है कभी-कभी

Thursday, October 13, 2011

ईश्वर और मनुष्य के बीच तीन बेतुकी कविताएं


एक

इंसान ही प्रतीक्षा नहीं करते किसी भगवान की
कि वह आए और उनके दुखदर्द दूर करे
भगवान भी राह देखता रहता है किसी इंसान की
जो आए और उसकी तकलीफ भी समझे
दरअसल सिर्फ भगवान जानता है कि
वह तभी तक है जब तक इंसान तकलीफ में है।
वह भी इंसान के दुख दर्द की पैदाइश है।
जिस दिन दुख-दर्द गएउस दिन भगवान भी गया।
शायद इसलिए भगवान दुख-दर्द बनाए रखता है
यानी यह इंसान को तकलीफ़ पहुंचाने से ज़्यादा अपने बने रहने की युक्ति है।
चाहें तो हम देख सकते हैं इस भगवान को कुछ सहानुभूति से,
आखिर हर कोई किसी तरह बचे रहने की जुगत में ही तो लगा रहता है.
फिर भगवान हमारे बहुत सारे बोझ उठाता भी है।
अपनी नाकामियों के लिए भी हम उसे ज़िम्मेदार ठहराते हैं
और
बेईमानी से अर्जित सफलताओं के लिए भी उसे प्रसाद चढ़ाते हैं
और नाकामियों और कामयाबी के बीच किए-अनकिए गुनाहों का एक पूरा सिलसिला होता है
जिसके लिए कभी हम भगवान से माफ़ी मांगते हैं और कभी आंख चुराते हैं
वह होता है इसलिए अपने को पलट कर देखने की ज़रूरत महसूस होती है
जो हैं, उससे ऊपर उठने का दबाव महसूस होता है।

दो

हममें से कुछ ऐसे भी हैं जो भगवान बनने की कोशिश में कुछ बेहतर इंसान बन गए।
हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि जो भगवान बनना चाहते हैंवे बेहतर मनुष्य बनना चाहते हैं
अक्सर भगवान होने की हमारी कामना के पीछे उसकी बेशुमार ताकत का खयाल होता है
दरअसल यह ताकत है जो भगवान को भी बनाती है और इंसान को भी दौड़ाती है।
ताकत हो तभी आप दूसरों को दुख दर्द दे भी सकते हैं और उन्हें दूर भी कर सकते हैं।
इस लिहाज से लगता है कि ताकत सबसे बड़ी चीज़ है।
ताकत हो तो आदमी कुछ भी कर सकता है
सीधे भगवान बन सकता है।
लेकिन ऐसा होता नहीं।
ताकत हासिल कर भगवान बनने निकला आदमी जानवर या हैवान ही बन पाता है।
यानी ताकत इंसान को इंसान भी नहीं रहने देती।
ताकत की ख्वाहिशें जैसे ख़त्म ही नहीं होतीं
वह हर जगह छा जाती हैहर चीज़ पर हावी हो जाती है।
बुद्धि परविवेक परजीवन की किसी भी दूसरी कसौटी पर।
यानी ठीक से नतीजा निकालें तो हम पाते हैं कि ताकत से आदमी उठता कम गिरता ज़्यादा है।
दरअसल जब वह इस ताकत की व्यर्थता समझ जाता है तो ज़्यादा बेहतर आदमी होता है
और
ज़्यादा बेहतर आदमी होता है तो देवता कहलाने लगता है।


तीन

ईश्वर और आदमी और ताकत के इस खेल को करीब से देखने पर
समझ में आता है कि ज़िंदगी का खेल दौड़ने से नहींछोड़ने से सधता है
वरना हम आगे-आगे दौड़ते जाते हैंपीछे की ज़मीन छूटती जाती है।
वैसे दौड़ने और छोड़ने से कहीं ज़्यादा तुक
छोड़ने और जोड़ने की मिलती है
जब हम कुछ छोड़ते हैं तो कुछ जोड़ते भी हैं
लेकिन अगर छोड़ने से पहले जोड़ने का खयाल आ जाए
तो वाक्य और जीवन दोनों में आखिर में छोड़ने की ही नौबत आएगी।
ध्यान से देखिए तो इस खेल में ताकत का सवाल भी पीछे छूट गया
और
ईश्वर का ख़याल भी,
वह कविता तो न जाने कहां रह गई
जो ताकत और ईश्वर को और इंसान और भगवान को जोड़ने और समझने की चाहत में शुरू की गई थी।
तो अब ऐसा करते हैंसबकुछ छोड़ देते हैं।
तय है कि इससे भगवान नहीं सधेगा,
इंसान भी नहीं सधेगा,
कविता भी नहीं सधेगी
लेकिन देर तक चुप रहकर देखिए
सबकुछ को छोड़कर खोकरसहकर देखिए
शायद इस मौन में
ईश्वर भी पांव दबाए चला आए
कविता भी आंख मलती हुई खड़ी हो जाए
मनुष्य भी सांस लेने लगे।

Monday, June 27, 2011

44वें जन्मदिन पर डॉक्टर इवा हजारी की याद

मुझे नहीं मालूम डॉ इवा हजारी
कि आप अब इस दुनिया में हैं भी या नहीं,
अगर हैं तो कहां हैं
और किस हाल में हैं,
न मैं आपको पहचानता हूं
और न आप मुझे पहचानती हैं
फिर भी हमारे-आपके बीच एक डोर है,
डोर जीवन की, जो सबसे पहले आपने थामी थी
मां की कोख से मुझे बाहर निकाला था
मेरी गर्भनाल काटी थी
और मुझे दुनिया की बांहों में सौंप दिया था।
मेरे जिस्म पर, मेरे वजूद पर, मेरे होने पर,
जो पहला स्पर्श पड़ा, वह आपका था
और मेरे जन्म की वह कहानी बताते-बताते
मां की आंखें अक्सर चमक उठती थीं,
यह प्रसंग छिड़ते ही वह अक्सर रांची के सदर अस्पताल के
उस ऑपरेशन थिएटर में पहुंच जाती थी,
जहां २४ जून, १९६७ की रात,
वह दर्द से कराहती लेटी थी
और फिर एक ममतामयी सी अंग्रेज- नहीं- ऐंग्लो इंडियन- डॉक्टर ने
उसे सहलाया था- तसल्ली और भरोसा दिलाते हुए-
और बताते-बताते हंस पड़ती थी मां
कि उस डॉक्टर के कहने पर १० तक गिन रही थी
कि उसे पता भी नहीं चला और एनीस्थीसिया दे दिया गया।
'जब आंख खुली तो बगल में तुम लेटे थे'।
कहानी यहां ख़त्म नहीं, शुरू होती है डॉक्टर,
वह युवा लड़की- जिसे आपने मातृत्व की सौगात दी थी- मेरी मां
अब इस दुनिया में नहीं है
जिससे यह कहानी में फिर से सुन सकूं
और नए सिरे से जी सकूं
मातृत्व और पारिवारिकता का वह छलछलाता हुआ मान
जिसके कई सिरे अलग-अलग लोगों से जुड़े थे-
मेरे कुछ बेख़बर और कुछ चिंतित युवा पिता से,
जो तब मुझसे आज के हिसाब से १७ साल छोटे रहे होंगे;
मेरी बिल्कुल लगी रहने वाली दादी और नानी से
जिनकी गोद में बरसों तक मैं पलता रहा;
मेरे भागदौड़ करते मामा-मौसी से
जो कभी-कभी मां के साथ मिलकर उन दिनों की छलछलाती याद बांटा करते थे।
आज ४४ साल बाद ये तार बहुत बिखरे-बिखरे हैं मेरी अनजान प्रथमस्पर्शिनी डॉक्टर,
बहुत से लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं,
और जो बहुत सारे लोग हैं, उनकी दुनिया बदल गई है।
मैं किससे पूछूं, किसके साथ बांटूं
उन प्रथम, सुकुमार दिनों का वह उजला अनुभव
जिस पर वक्त की मिट्टी और धूल बहुत मोटी हो गई है।
मैं भी तो बदल गया हूं।
अब समझ भी नहीं पाता,
वे कौन लोग थे और किसे सुनाते थे
मेरे मामूली से जन्म के बहुत गैरमामूली और जादुई लगते ब्योरे।
इन ४४ वर्षों में और भी बहुत कुछ बदला है, बिखरा है, गंदला हुआ है।
उस सदर अस्पताल को तो आप बिल्कुल नहीं पहचान पाएंगी
जहां किसी साफ़ सुथरे कमरे में आपने मेरी मां की देखभाल की होगी।
सरकारी अस्पताल इन दिनों सेहत का नहीं, बीमारी का घर लगते हैं
और वह रांची शहर भी बहुत बदल गया है
जो उन दिनों एक ख़ामोश कस्बा रहा होगा।
उस ख़ामोश कस्बे के इकलौते सरकारी अस्पताल में ही संभव रहा होगा
कि एक मरीज़ अपने डॉक्टर से ऐसा नाता जोड़े
जिसकी विरासत अपने बेटे तक छोड़ जाए।
इस बेटे को भी हालांकि कहां से पहचानेंगी आप?
आपके हाथों से तो न जाने कितने अनजान शिशुओं ने जीवन का वरदान ग्रहण किया होगा।
लेकिन आप इस दुनिया में हों न हों,
आपको यह यकीन दिलाना चाहता हूं
कि आपका दिया हुआ जो जीवन था
उसे अब तक क़ायदे से जिया है डॉक्टर।
ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे आपका प्रथम स्पर्श लजाए, ख़ुद को संकुचित महसूस करे।
निश्चय ही इस जीवन में अपनी तरह की क्षुद्रताएं आईं, कहीं-कहीं ओछापन भी,
शर्मिंदगी के कुछ लम्हे भी, भय की कुछ घड़ियां भी।
कई नाइंसाफ़ियों से आंख मिलाने से बचता रहा
और कहीं-कहीं घुटने भी टेके
लेकिन इन सबसे निकलता रहा मैं,
किसी विजेता की तरह नहीं,
बल्कि अपनी हारी हुई मनुष्यता को
नए सिरे से आत्मा का जल देते हुए, भरोसे की थपकी देते हुए।
शर्म करने लायक कुछ न करना,
न घुटने टेकना, न डरना,
नाइंसाफ़ी से आंख मिलाना
और जो सही लगे, उसके साथ खड़ा होने की कोशिश करना सीखते हुए।
हालांकि यह आसान नहीं है
और जीवन हर रो़ज़ लेता है नए सिरे से इम्तिहान।
लेकिन इस काम में बहुत सारे हाथ मेरा साथ देते हैं
बहुत सारी निगाहें मुझे बचाए रखती हैं।
वे भी जो दुनिया में हैं और वे भी जो दुनिया में नहीं हैं।
अक्सर तो नहीं, लेकिन कभी-कभी जब बहुत घिर जाता हूं
तो एक हाथ अचानक अपने कंधों पर पाता हूं
उस स्त्री का, जो मेरी लंबी उम्र की कामना के लिए जीवित नहीं है
लेकिन जिसकी न जाने कितनी कामनाएं- लंबी उम्र से लेकर अच्छे जीवन तक की- मेरे वजूद पर
किसी कवच की तरह बनी हुई हैं।
आज अपने 44वें जन्मदिन पर
उसी हाथ को महसूस करते-करते
उन चमकती आंखों की
और उनके सहारे आपकी याद आई है डॉक्टर इवा हजारी।
क्या आपको याद है
अपने ऑपरेशन टेबल पर ४४ साल पहले लेटी वह युवा स्त्री
जो मेरी मां थी?
पता नहीं, आप इस दुनिया में हैं या नहीं,
हैं भी तो कहां हैं,
लेकिन मेरी स्मृति में, मेरे संवाद में,
आपकी उजली उपस्थिति मेरे जीवन को
बिल्कुल उस लम्हे, उस कोने, उस कमरे तक ले जाती है
जहां से इसकी शुरुआत हुई थी।
वहां बस हम तीन थे-मां, आप और मैं।
हम तीनों जीवित हैं डॉक्टर।
आखिर आपने जो जीवन दिया है,
उसमें आपका भी तो जीवन शामिल है
और
मेरी मां तो मेरे साथ रहेगी ही।

Sunday, March 27, 2011

ईश्वर से


ईश्वर।

सोचता हूं,

तुम्हारे ख़िलाफ़ बगावत का एक परचम

बुलंद करूं।




संपूर्ण तुम, तटस्थ तुम, निर्लिप्त तुम,

सबके निर्माता सबके नियंता।

मेरे अधूरेपन पर उठी हुई उंगली तुम।

तुम उन अंशों में हो, जहां हम नहीं हैं।



हमारे भीतर उपजे हुए डर तुम।

हमारे तमाम डरों में सहचर तुम।

मेरे आकार की सीमा तुम्हारे निराकार से आहत होती है प्रभु।



सभी कर्मों से विरत तुम।

सभी परिणामों से परे।

सभी तृष्णाओं से ऊपर तुम,

सभी तृप्तियों से निष्काम।


तुम्हारे होने का भाव

वह अंधकार है

जो हमें घेरता है बार-बार।

हमारी आस्था नहीं

हमारी आस्था का कच्चापन

तुम्हें टेरता है बार-बार।

Saturday, September 4, 2010

जलेबी और चाकू

किसी गर्म, कुरमुरी, जायकेदार जलेबी को मुंह में रखने
और उसे गप कर जाने से पहले उसकी खुशबू और उसके रस का पूरा आनंद
लेने के बीच क्या आपने ध्यान दिया है कि
हमारी भाषा कैसे-कैसे बेख़बर अत्याचार करती है?
अगर किसी को आप जलेबी जैसा सीधा कहते हैं
तो ये उसके टेढ़ेपन पर व्यंग्य भरी टिप्पणी होती है
जबकि सच्चाई यह है कि अपने रूपाकार को छोड़कर- जिसमें उसका
अपना कोई हाथ नहीं है- वह वाकई सीधी होती है।
पहले रस को अपने भीतर घुलने देती है
और फिर बड़ी आसानी से मुंह के भीतर घुल जाती है
जो थोड़ा बहुत कुरमुरापन रहता है, वह उसका जायका ही बढ़ाता है।
कभी चाव से जलेबी खाते हुए और कभी दिल्लगी में दूसरों से अपने जलेबी जैसा
सीधा होने की तोहमत सुनते हुए अक्सर मुझे लगता है
कि वह भाषा भी कितनी सतही होती है जो बाहरी रूप देखकर
किसी से सीधे या टेढे होने का ऐसा नतीजा तय कर देती है जो घिस-घिस कर मुहावरे में बदल जाता है।
लेकिन यह नादानी है या सयानापन है?
कि लोग जलेबी को टेढा बताते हैं?
यह जानते हुए कि वह कुछ बिगाड़ नहीं सकती
आम तौर पर बाकी पकवानों की तरह हाजमा भी ख़राब नहीं कर सकती।
अगर सिर्फ आकार-प्रकार से तय होना हो
कौन सीधा है, कौन टेढ़ा
तो सीधा-सपाट चाकू कहीं ज्यादा मासूम लगेगा जो
सीधे बदन में धंस सकता है
और जलेबी बेचारी टेढ़ी लगेगी जो टूट-टूट कर
हमारे मुंह में घुलती रहती है।
लेकिन जलेबी और चाकू का यह संयोग सिर्फ सीधे-टेढ़े के फर्क को बताने के लिए नहीं चुना है
यह याद दिलाने के लिए भी रखा है कि
जलेबी मुंह में ही घुलेगी, चाकू से नहीं कटेगी
और चाकू से जलेबी काटना चाहें
तो फिर किसी और को काटने के पहले चाकू को चाटने की इच्छा पैदा होगी।
यानी चाकू जलेबी को नहीं बदल सकता
जलेबी चाकू को बदल सकती है
हालांकि यह बेतरतीब लगने वाला तर्क इस तथ्य की उपेक्षा के लिए नहीं बना है
कि जलेबी हो या चाकू- दोनों का अपना एक चरित्र है
जिसे हमें पहचानना चाहिए
और कोशिश करनी चाहिए कि हमारा रिश्ता चाकू से कम, जलेबी से ज्यादा बने।
लेकिन कमबख्त यह जो भाषा है
और यह जो दुनिया है
वह जलेबी को टेढ़ेपन के साथ देखती है, उसका मजाक बनाती है
और
सीधे सपाट चाकू के आगे कुछ सहम जाती है।

Monday, July 13, 2009

सोया हुआ वह परिवार

सड़क के बिल्कुल किनारे
गुडी-मुडी सोया दिखा वह परिवार
नीचे की रेत पर बिछी तुड़ी-मुड़ी चादर के मुचड़े हुए सिरे
और उसके भीतर सिकुड़े बदन बता रहे थे
कि चादर के हिसाब से पांव समेटने का अभ्यास
पुराना है
बगल के प़ेड़ के पास तने से बंधी संदूक दिखी
और सिहरा हुआ मैं बस इतना सोच पाया
कि पूरा घर साथ चला है।
यह रात दस बजे के आसपास का समय होगा
जो दिल्ली या गाज़ियाबाद की भीड़ भरी सड़कों पर
सोने के लिहाज से काफी असुविधाजनक होता है
फिर भी सोया हुआ था पूरा परिवार
बेख़बर गहरी नींद में,
इस बात से बेपरवाह कि कहीं कोई उसका संदूक
तो नहीं चुरा ले जाएगा।
शायद इसलिए नहीं कि संदूक में चुराने लायक
कुछ नहीं रहा होगा,
यह असंवेदनशील ख़याल हमारी तरह के
लोगों को ही आ सकता है जो
पुराने पड़ गए कपड़ों और संदूकों को बेकार समझ कर
अपनी आत्मतुष्ट दया पर इतराते हुए
महरी या मजदूर या कबाड़ीवाले या चौकीदार
किसी को भी पकड़ा देते हैं।

हो सकता है, इस सोए हुए परिवार को
भी कहीं से मिला ही हो वह संदूक
और उसमें भी किसी के दिए हुए बेडौल कपड़े ही ठुंसे पड़े
हों कुछ पुराने बर्तनों और बहुत सहेजकर रखी गई कुछ चूड़ियों
और कुछ टूटे खिलौनों के बीच,
लेकिन इस विस्थापित समय में
यह उसकी सबसे मूल्यवान थाती है
उसका छूटा हुआ घर है
उसकी छूटी हुई याद है
बच्चों की अधनींदी आंखों की आखिरी चमकती उम्मीद है
घरवाली का ठहरा हुआ अपार धीरज है
और किसी मेहनतकश के न ख़त्म होने वाले सफ़र का इकलौता असबाब है
फिर भी यह परिवार इस संदूक को भूलकर
चादर के नीचे से सड़क किनारे की चुभती हुई रेत
पर ही नींद की गहरी सांसें ले आ रहा है
तो समझना चाहिए, वह बहुत दूर से पैदल चलकर आया है
इतना थका हुआ है कि उसकी थकान उसके पूरे वजूद पर,
उसकी सारी चिंताओं पर हावी है,
इस डर पर भी कि कोई अचानक आकर उसे उठा नहीं देगा।
यह सोचकर कलेजा मुंह को आता है
कि छोटे-छोटे बच्चों ने भी सूखी जीभ, डरी हुई आंखों
और जलते हुए पांवों के बीच यह सफर तय किया होगा।

लेकिन इतना क्यों सोच रहा हूं मैं इस परिवार के बारे में?
जिस राजधानी से मैं रोज़ गुज़रता हूं
उसकी कई सड़कों पर ऐसे सैकड़ों परिवार सोए होते हैं
उनके पास भी ऐसे ही संदूक होते होंगे, ऐसी ही चादरें
उनके नीचे रेत की यही चुभन होती होगी
और इतनी ही गहरी थकान
कि आती-जाती गाड़ियों के शोर
में भी वे सो लेते होंगे।
फिर क्यों अपनी सोसाइटी के बाहर अचानक
दिख गया यह परिवार मेरे भीतर इतनी करुणा जगा रहा है
कि पूरे परिवार को उठाकर कायदे का खाना खिलाकर कहीं ठीक से सुला
देने की बड़ी गहरी इच्छा जागती है
और जिसे दबाने की कोशिश में मैं
खुद को दबा हुआ और कातर महसूस करता हूं।
क्या इसलिए कि इस वक्त मैं पैदल चल रहा हूं
और मेरी आंखें आसपास देख पा रही हैं?
या इसलिए कि ठीक अपने पड़ोस में ऐसा पड़ोस
मुझे विचलित कर रहा है।

समझने की बात सिर्फ इतनी है कि
इस महानगर में रहते हुए
हम आंख मूंद कर ही जी पाते हैं।
तेज-तेज चलाते हैं गाड़ी, तेज-तेज़ करते हैं बहस,
घर या दफ़्तर या म़ॉल से निकल कर
तेज-तेज कदमों से पहुंचते हैं पार्किंग तक
और फिर चढ़ा लेते हैं शीशे
चला लेते हैं एसी और स्टीरियो
कि बाहर की धूल और ध्वनियां
शीशे पर सिर पटक कर लौट जाएं।
तेजी से चलाते हुए गाड़ी
इस तरह निकलते हैं, जैसे दुनिया के सबसे ज़रूरी काम
हमारे लिए ही छूटे पड़े हैं।
इन सबके बावजूद
ठीक अपनी सोसाइटी के बाहर
इत्मिनान से शुरू हो रही एक
रात की बेखबर चहलकदमी में
जब पेड़ के नीचे दिख जाता है कोई परिवार
गुडीमुडी सोया हुआ
कोई संदूक पेड़ से लगा हुआ,
कुछ मुड़े हुए पांवों को ढंकने में नाकाम चादर मुचड़ी हुई
तो लगता है, उस परिवार की गरीबी
हमारे मुंह पर थप्पड़ मार रही है।

कहां से आया है यह परिवार?
कितनी दूर चलकर?
क्या छोड़कर?
क्या सोचकर?
क्य़ा कुछ करने के इरादे से?
क्यों अपने घर और गांव छोड़कर चले आ रहे हैं
इतने सारे परिवार?
कौन है इनके विस्थापन का ज़िम्मेदार?

जानता हूं, जब नींद आने लगेगी,
ये सारे सवाल खत्म हो जाएंगे
नहीं सोचूंगा
कि महानगर की एक अनजानी सडक के किनारे
कैसे कटी होगी इस परिवार की रेतीली-चुभती हुई, पहली फटेहाल रात?
सुबह मर्द कहीं मजदूरी खोजेगा
औरत कहीं करेगी बर्तन-बासन
और बच्चे शुरू में शहर की नई गाड़ियों को
हैरानी और कौतूहल से देखेंगे
और फिर उन्हें पोछते-पोछते बडे हो जाएंगे।