दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय के एक छोटे से कमरे में उपस्थित युवा चेहरों को देखकर मुझे तसल्ली से ज़्यादा अंदेशा हुआ- क्या ‘चक दे इंडिया’ या ‘तारे ज़मीं पर’ जैसी चमकदार मुंबइया फिल्मों के आदी इन लड़कों को संजय काक की करीब सवा दो घंटे लंबी डॉक्युमेंटरी अपने साथ रख पाएगी? एक ऐसी डॉक्युमेंटरी, जिसमें अलग से कोई कहानी नहीं है, कोई नायक नहीं है और एक ऐसा पेचीदा यथार्थ है जिसका गड्डमड्ड इतिहास-भूगोल जैसे लगातार बदलता, और हाथ और दिमाग से फिसलता मालूम होता है?
लेकिन ‘जश्ने आज़ादी’ शुरू हुई तो सारे अंदेशे पीछे छूट गए। उस कमरे की रंगहीन सफेद दीवार पर उभरती तसवीरों और आवाज़ों के कोलाज में दीवार खो गई, कमरा खो गया और कमरे में पर्याप्त उजाले के बावजूद वे चेहरे खो गए जो फिल्म देखने इकट्ठा थे। धीरे-धीरे खुलता रहा कश्मीर नाम की उस वादी का सच, जिसमें आजादी एक छलने वाला शब्द है। यह एक नुचा-चिंथा कश्मीर है, जहां गिरती हुई बर्फ के फाहों के बीच एक पिता कब्रगाह में अपने बेटे की कब्र खोज रहा है- वह एचके, यानी हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का कमांडर था, मारा गया। पिता ईद के दिन आया है, ताकि उसके नाम भी दुआ पढ़ सके। इस कश्मीर में लोग इस तरह मारे गए लोगों की गिनती कर रहे हैं जैसे वे कुछ खोए हुए सामान याद कर रहे हों। इस कश्मीर में एक छोटी सी लड़की अपने सामने हुई मुठभेड़ का हवाला देते-देते घबरा सी जा रही है। इस कश्मीर में अपने खोए हुए बच्चे की तस्वीर लेकर घूमते उसके घरवाले हैं। इस कश्मीर में अपने दिलों पर दहशत के निशान लिए जी रही बच्चियां ख्वाबों में अपने मर रहे पिता को देखती हैं। इन सबके बीच अमरनाथ यात्रा पर आया हुआ एक साधु कश्मीर की तरफ आंख उठाकर देखने वालों की आंख निकाल लेने की धमकी देता है।
नहीं, यह कोई भावनाओं को उभारने वाली फिल्म नहीं है। संजय काक ने शायद प्रयत्नपूर्वक खुद को इस आसान रास्ते से अलग रखा है। ये सारे दृश्य आपको खोजने पड़ते हैं- यह समझने के लिए कि वह कौन सी चीज़ है जो इस सपाट लगती फिल्म में आपको फिर भी बेचैन बनाए रखती है, जो आपको भावुक होकर कुछ देर बाद फिल्म को भूल जाने का मौका नहीं देती। इस तलाश में आप जब सूने लाल चौक पर तिरंगा फहराते और जन-गण-मन गाते भारतीय सैनिकों या फिर पूरे जोर-शोर से आजा़दी का नारा उछालते हुजूम के पीछे झांकते हैं तब इन चेहरों पर आपकी नज़र पड़ती है। तब आपको कश्मीर के सन्नाटे या शोर के पीछे की वह कारुणिकता, वह त्रासदी दिखाई पड़ती है जिसमें जले हुए घर हैं, सूखे हुए ख़ून सी सूख चुली रुलाइयां हैं और ताजा गिरे खून को साफ करने की नाकाम सी कोशिश है।
संजय काक न ज़्यादा दिखाते हैं न ज़्यादा बोलते हैं। वे स्थितियों और चरित्रों को बोलने देते हैं। कश्मीर की बेहद दिलकश झील के ऊपर तैरती है एक कवि की आवाज़- खोए हुए ज़मानों और ठिकानों को अपने सोज़, अपनी तकलीफ़ के साथ सहेजती आवाज़। इस तकलीफ के आसपास वे फूहड़ सैलानी निगाहें भी हैं जिनके लिए कश्मीर बस एक फिसलती हुई बर्फ या एक ख़ूबसूरत बाग़ है। इन सैलानियों की चीखती हुई आवाज़ें बताती हैं कि यह कश्मीर तो स्विट्जरलैंड से भी सुंदर है। सैलानियों के अलावा सैनिक हैं- कहीं अनाथ हुए बच्चों का स्कूल चलाते, कहीं ट्रांजिस्टर बांटते और ये वादा करते कि और भी अच्छी-अच्छी चीजें आएंगी और सबको मिलेंगी। पूरी फिल्म में कदम-कदम पर अंतर्विरोधों का यह जाल आपके पांव रोकता है, कई बार लगता है, अब ये फिल्म खत्म हो।
लेकिन फिल्म खत्म हो जाने के बाद भी ख़त्म नहीं होती। एक विशुद्ध राजनीतिक फिल्म होते हुए भी इसका राजनीतिक पाठ आसान नहीं है। सिर्फ इतना दिखाई पड़ता है कि सात लाख सैनिकों से भरे इस कश्मीर में अब भी गणतंत्र दिवस सन्नाटे के साथ मनाना पड़ता है और स्कूली बच्चों के कार्यक्रम में भी सुरक्षा का अभेद्य घेरा खड़ा करना पड़ता है। दूसरी तरफ जब भी सेना द्वारा तथाकथित मुठभेड़ में मारे गए किसी लडके की मय्यत निकलती है तो जैसे वह कश्मीर की आजादी के लिए निकाले गए जुलूस में तबदील हो जाती है। जाहिर है, भारत की वर्चस्ववादी राजनीति और सैन्य नीति के खिलाफ कश्मीर का गुस्सा सारे दमन के बावजूद कायम है।
हालांकि फिल्म इतिहास और वर्तमान को लेकर कई सवाल खड़े करती है। संजय काक कश्मीरियों के संघर्ष को पांच सौ साल की गुलामी से जोड़कर देखते हैं। इसमें एक तरह का अवांछित सरलीकरण चला आता है जिसमें वह विडंबना आसानी से समझ में नहीं आती जो १९४७ के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच झूल रहे कश्मीर के समाज और राजनीति में पैदा हुई है। दूसरी बात यह कि जिस कश्मीरियत की बात बार-बार की जाती है, उसे यह फिल्म परिभाषित करने की कोशिश नहीं करती। अगर करती तो यह बात शायद ज़्यादा खुलकर आती कि पहचानों की कोई एक परिभाषा नहीं होती, उनकी कई परतें होती हैं और कश्मीरियत भी ऐसी कई परतों से मिलकर बनी चीज है।
बहरहाल, संजय को न सवाल खड़े करने की फ़िक्र है न जवाब खोजने की जल्दी। न ही कोई कहानी बुनने की कोशिश उनमें दिखती है। वे गड्डमड्ड तारीखों और जगहों के बीच हमें वह कश्मीर दिखाते हैं जहां बीस साल में १८,००० से ज्यादा लोगों ने जान गंवाई है, उन कब्रिस्तानों में ले चलते हैं जहां लोग नाम और चेहरों से नहीं, नंबरों से पहचाने जाते हैं। इस पूरी फिल्म में कोई कश्मीरी पंडित नहीं दिखता- और संजय इसे भी कश्मीर के उस खालीपन की तरह पेश करते हैं जिस पर लोगों का ध्यान जाना चाहिए- एक पेंटिंग में खाली छूटी उस जगह की तरह, जो पेंटिंग को फिर भी अर्थ देती है।
शायद इसी तटस्थता के कारण फिल्म न कहीं शुरू होती है, न कहीं खत्म होती है। वह जैसे चलती रहती है- ख़त्म हो जाने के बाद भी। दिल्ली विश्वविद्यालय के उस कमरे में फिल्म के खत्म होते-होते बैठे हुए लडकों की तादाद अचानक बढ चुकी थी और उनके पास ढेर सारे सवाल थे। कश्मीर का बेहद मुश्किल यथार्थ समझने की कोशिश में पूछे गए सवाल, फिल्म की राजनीति और तटस्थता से जुड़े सवाल। इन सवालों के बीच साफ था कि ‘जश्ने आज़ादी’ अपने मक़सद में कामयाब रही है- वह दूर से छूती है और बिना अहसास कराए बहुत भीतर तक उतर जाती है। ये एक बड़ी कामयाबी है।
Tuesday, March 11, 2008
Monday, March 10, 2008
लाल बत्ती
लाल बत्ती पर जैसे ही तुम मारते हो ब्रेक
और आगे-पीछे दाएं-बाएं लगी गाड़ियों का जायज़ा लेने की कोशिश करते हो
एक ठक-ठक सी सुनाई पड़ती है शीशे पर
और तुम चौंक कर देखते हो
एक चेहरा जिसे देखते हुए डर लगता है
कोई इशारा कर रहा है अपने रक्त सूखे दाग़दार मुंह की तरफ
या गोद में पड़े पट्टियों से बंधे हुए एक छोटे से बच्चे की तरफ
बस पीछा छुड़ाने की ही गरज से
तुम जेब या कार में बनी दराज़ देखते हो
और अगर कोई छोटा सा सिक्का मिल जाए तो शीशा नीचे कर
उसकी तरफ़ बढ़ा देते हो
बत्ती हरी हो जाती है,
कारें निकल जाती हैं
तुम भी लाल बत्ती से निकल आने की राहत या रफ़्तार का मज़ा लेने लगते हो
यह रोज़ का क़िस्सा है
जो तुम्हें अक्सर संशय में डाल देता है
कि ऐसे भिखमंगों के साथ क्या किया जाए
आख़िर रोज़-रोज़ जाने-पहचाने रास्तों पर दिखने लगें
वही जाने-पहचाने चेहरे
जो चमकती, बंद, आरामदेह गाड़ी में चल रहे तुम्हारे सफ़र को कुछ बेरौनक, कुछ किरकिरा कर दें
जो तुम्हें याद दिलाएं कि तुम्हारी बढ़ रही संपन्नता
सड़क पर दिखने वाली ग़रीबी के मुकाबले लगभग अश्लील है और
सबसे ज्यादा तुम्हें ही चुभ रही है
तो तुम्हारे भीतर कुछ ऊब, कुछ खीज और कुछ आत्मग्लानि से मिली-जुली
एक ऐसी वितृष्णा पैदा होती है
जिसमें तुम उस ठक-ठक करते भिखमंगे की तरफ ही नहीं
अपनी तरफ़ भी देखना बंद कर देते हो
फिर तुम तलाशने लगते हो वे तर्क, जिनके सहारे ख़ुद को दे सको तसल्ली
कि इन भुक्खड़ों को भीख न देकर, उनकी आवाज़ न सुनकर, उनकी तरफ़ न देखकर
तुम बिल्कुल ठीक करते हो।
ऐसे मौकों पर कई तर्क तुम्हारी मदद में चले आते हैं
सबसे पहले तुम याद करते हो दिल्ली पुलिस का वह कानून
जो लाल बत्ती पर भिखमंगों को सिक्के देने से मना करता है
फिर तुम याद करते हो वे ख़बरें जो बताती हैं कि
भिखमंगों का ये पूरा गिरोह है
जो खाए-पिए अघाए और रेडलाइट पर रुके लोगों की आत्मदया
के सहारे चल रहा है
कि यहां भीख मांगने के लिए बड़े और बच्चों के बाकायदा हाथ-पांव तोड़े जाते हैं
और तुम सिहरते हुए सोचते हो
कि तुम्हारी दया न जाने कितने ऐसे मासूम बच्चों के लिए उम्र भर का अभिशाप
बन रही है
धीरे-धीरे तुम खुद को आश्वस्त करने की कोशिश करते हो
और उनकी तरफ देखना बंद कर देते हो
यह समझते हुए भी कि सारे तर्कों के बावजूद दिसंबर की सर्द रात में
यह जो ठिठुरती सी औरत अपने बच्चे को चिपकाए लाल बत्ती पर
तुम्हारी दया पर दस्तक दे रही है
उसे तर्क की नहीं, बस कुछ सिक्कों की ज़रूरत है-
उतने भर भी उसके लिए ज़्यादा हैं जो
तुम सिगरेट न पीने की वैधानिक चेतावनी को नजरअंदाज़ करते हुए
रोज़ सिगरेट में उडा देते हो
या फिर जिससे कई गुना ज्यादा पैसे तुम्हारे बच्चे के किसी पांच मिनट के
खेल में लग जाते हैं।
कई बार तो तुम बस इसलिए पैसे नहीं देते
कि गर्मियों में एसी कार के शीशे उतारने की जहमत कौन मोल ले
धीरे-धीरे तुम्हारी झुंझलाहट और हैरानी बढ़ती जाती है
आखिर सरकार या पुलिस कुछ करती क्यों नहीं
इन भिखारियों को रास्ते से हटाने के लिए?
कभी बत्ती के लाल से हरा होने के दौरान कोई कुचल कर मारा गया
तो तुम्हीं गुनहगार ठहरा दिए जाओगे
तुम अपने ईश्वर से- जिसे तुम बाकी मौकों पर याद नहीं करते- मनाते हो
कि कभी तुम्हें किसी ऐसे हादसे का हिस्सा न होना पड़े।
लेकिन ये रोज़ का किस्सा है जो अपने दुहराव के बावजूद, तुम्हारे सारे तर्कों के बावजूद
तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ता
लाल बत्ती के बाद भी वे चेहरे बने रहते हैं जो तुम्हारी रफ़्तार में कुछ खलल डालते हैं
इन्हें भुलाने की बहुत सारी कोशिशों के बावजूद तुम
खुद से पूछने से बच नहीं पाते
कि आखिर लाल बत्तियों पर तुम्हारी ओढ़ी हुई तटस्थता
तुम्हें चुभती क्यों है?
हैरान करने वाली बात है कि इन सबके बावजूद तुम कुछ करते नहीं
यह निश्चय भी नहीं कि अपनी दुविधा से उबरने के लिए तुम
लाल बत्ती पर दिखने वाले चेहरों को रोज कुछ सिक्के दे दिया करोगे
क्योंकि शायद यह अहसास तुम्हें है
कि इस दुनिया में कंगालों और भिखमंगों की तादाद इतनी ज्यादा है
कि तुम चाहकर भी सबकी मदद नहीं कर सकते, सबका पेट नहीं भर सकते
कभी इस अहसास को ठीक से टटोलो तो और भी नए और हैरान करने वाले नतीजों तक पहुंचोगे
तब लगेगा कि दूसरों के ज़ख़्म सने चेहरों जितना ही भयानक है तुम्हारा चेहरा भी
जिसे तुम खुद देख नहीं पा रहे हो
लेकिन यह असुविधाजनक सवालों से बच निकलने का कौशल ही है
जिसके सहारे तुमने तय किया है इतना लंबा सफ़र
एक छोटी सी रेडलाइट के उलझाने वाले साठ सेकेंड
तुम्हें या तुम्हारे सफ़र को कैसे रोक पाएंगे?
और आगे-पीछे दाएं-बाएं लगी गाड़ियों का जायज़ा लेने की कोशिश करते हो
एक ठक-ठक सी सुनाई पड़ती है शीशे पर
और तुम चौंक कर देखते हो
एक चेहरा जिसे देखते हुए डर लगता है
कोई इशारा कर रहा है अपने रक्त सूखे दाग़दार मुंह की तरफ
या गोद में पड़े पट्टियों से बंधे हुए एक छोटे से बच्चे की तरफ
बस पीछा छुड़ाने की ही गरज से
तुम जेब या कार में बनी दराज़ देखते हो
और अगर कोई छोटा सा सिक्का मिल जाए तो शीशा नीचे कर
उसकी तरफ़ बढ़ा देते हो
बत्ती हरी हो जाती है,
कारें निकल जाती हैं
तुम भी लाल बत्ती से निकल आने की राहत या रफ़्तार का मज़ा लेने लगते हो
यह रोज़ का क़िस्सा है
जो तुम्हें अक्सर संशय में डाल देता है
कि ऐसे भिखमंगों के साथ क्या किया जाए
आख़िर रोज़-रोज़ जाने-पहचाने रास्तों पर दिखने लगें
वही जाने-पहचाने चेहरे
जो चमकती, बंद, आरामदेह गाड़ी में चल रहे तुम्हारे सफ़र को कुछ बेरौनक, कुछ किरकिरा कर दें
जो तुम्हें याद दिलाएं कि तुम्हारी बढ़ रही संपन्नता
सड़क पर दिखने वाली ग़रीबी के मुकाबले लगभग अश्लील है और
सबसे ज्यादा तुम्हें ही चुभ रही है
तो तुम्हारे भीतर कुछ ऊब, कुछ खीज और कुछ आत्मग्लानि से मिली-जुली
एक ऐसी वितृष्णा पैदा होती है
जिसमें तुम उस ठक-ठक करते भिखमंगे की तरफ ही नहीं
अपनी तरफ़ भी देखना बंद कर देते हो
फिर तुम तलाशने लगते हो वे तर्क, जिनके सहारे ख़ुद को दे सको तसल्ली
कि इन भुक्खड़ों को भीख न देकर, उनकी आवाज़ न सुनकर, उनकी तरफ़ न देखकर
तुम बिल्कुल ठीक करते हो।
ऐसे मौकों पर कई तर्क तुम्हारी मदद में चले आते हैं
सबसे पहले तुम याद करते हो दिल्ली पुलिस का वह कानून
जो लाल बत्ती पर भिखमंगों को सिक्के देने से मना करता है
फिर तुम याद करते हो वे ख़बरें जो बताती हैं कि
भिखमंगों का ये पूरा गिरोह है
जो खाए-पिए अघाए और रेडलाइट पर रुके लोगों की आत्मदया
के सहारे चल रहा है
कि यहां भीख मांगने के लिए बड़े और बच्चों के बाकायदा हाथ-पांव तोड़े जाते हैं
और तुम सिहरते हुए सोचते हो
कि तुम्हारी दया न जाने कितने ऐसे मासूम बच्चों के लिए उम्र भर का अभिशाप
बन रही है
धीरे-धीरे तुम खुद को आश्वस्त करने की कोशिश करते हो
और उनकी तरफ देखना बंद कर देते हो
यह समझते हुए भी कि सारे तर्कों के बावजूद दिसंबर की सर्द रात में
यह जो ठिठुरती सी औरत अपने बच्चे को चिपकाए लाल बत्ती पर
तुम्हारी दया पर दस्तक दे रही है
उसे तर्क की नहीं, बस कुछ सिक्कों की ज़रूरत है-
उतने भर भी उसके लिए ज़्यादा हैं जो
तुम सिगरेट न पीने की वैधानिक चेतावनी को नजरअंदाज़ करते हुए
रोज़ सिगरेट में उडा देते हो
या फिर जिससे कई गुना ज्यादा पैसे तुम्हारे बच्चे के किसी पांच मिनट के
खेल में लग जाते हैं।
कई बार तो तुम बस इसलिए पैसे नहीं देते
कि गर्मियों में एसी कार के शीशे उतारने की जहमत कौन मोल ले
धीरे-धीरे तुम्हारी झुंझलाहट और हैरानी बढ़ती जाती है
आखिर सरकार या पुलिस कुछ करती क्यों नहीं
इन भिखारियों को रास्ते से हटाने के लिए?
कभी बत्ती के लाल से हरा होने के दौरान कोई कुचल कर मारा गया
तो तुम्हीं गुनहगार ठहरा दिए जाओगे
तुम अपने ईश्वर से- जिसे तुम बाकी मौकों पर याद नहीं करते- मनाते हो
कि कभी तुम्हें किसी ऐसे हादसे का हिस्सा न होना पड़े।
लेकिन ये रोज़ का किस्सा है जो अपने दुहराव के बावजूद, तुम्हारे सारे तर्कों के बावजूद
तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ता
लाल बत्ती के बाद भी वे चेहरे बने रहते हैं जो तुम्हारी रफ़्तार में कुछ खलल डालते हैं
इन्हें भुलाने की बहुत सारी कोशिशों के बावजूद तुम
खुद से पूछने से बच नहीं पाते
कि आखिर लाल बत्तियों पर तुम्हारी ओढ़ी हुई तटस्थता
तुम्हें चुभती क्यों है?
हैरान करने वाली बात है कि इन सबके बावजूद तुम कुछ करते नहीं
यह निश्चय भी नहीं कि अपनी दुविधा से उबरने के लिए तुम
लाल बत्ती पर दिखने वाले चेहरों को रोज कुछ सिक्के दे दिया करोगे
क्योंकि शायद यह अहसास तुम्हें है
कि इस दुनिया में कंगालों और भिखमंगों की तादाद इतनी ज्यादा है
कि तुम चाहकर भी सबकी मदद नहीं कर सकते, सबका पेट नहीं भर सकते
कभी इस अहसास को ठीक से टटोलो तो और भी नए और हैरान करने वाले नतीजों तक पहुंचोगे
तब लगेगा कि दूसरों के ज़ख़्म सने चेहरों जितना ही भयानक है तुम्हारा चेहरा भी
जिसे तुम खुद देख नहीं पा रहे हो
लेकिन यह असुविधाजनक सवालों से बच निकलने का कौशल ही है
जिसके सहारे तुमने तय किया है इतना लंबा सफ़र
एक छोटी सी रेडलाइट के उलझाने वाले साठ सेकेंड
तुम्हें या तुम्हारे सफ़र को कैसे रोक पाएंगे?
Wednesday, March 5, 2008
आमने-सामने कवि
(आदरणीय विष्णु खरे और विष्णु नागर से क्षमायाचना सहित)
बहुत मुमकिन हैं
आप एक की उम्मीद कर रहे हों
और दूसरा निकल आए
आखिर दोनों बिल्कुल आमने-सामने रहते हैं
और ऐसी चूक तो हो सकती है कि सोसाइटी के दरबान के समझाने के बावजूद
आप ठीक से समझ न पाएं कि बाएं वाला या दाएं वाला फ्लैट विष्णु नागर का है
और आप विष्णु खरे के घर की घंटी बजा दें।
यह जानकर कि नागर से मिलने की कोशिश में आप खरे के घर चले आए हैं,
विष्णु जी की प्रतिक्रिया क्या होगी, ये मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता
क्योंकि उनकी प्रतिभा, विदग्धता और उनके वाक चातुर्य का लोहा सब मानते हैं
और मैं भी कायल रहा हूं उनकी प्रखर टिप्पणियों, उनकी उनसे भी प्रखर कविताओं का-
आप ध्यान देंगे कि मैं इस कविता में भी उनकी शैली की नकल करने की कितनी नाकाम सी कोशिश कर रहा हूं।
बहरहाल, मैं आपकी जगह होऊं तो शायद विष्णु जी की डांट सुनकर भी पुलकित हो जाऊं कि देखो हिंदी के दो कवि बिल्कुल आमने सामने रहते हैं।
यह पुलक इस बात से कम नहीं होगी, शायद कुछ बढ ही जाए कि
विष्णु जी डांटें नहीं, सीधे बता दें कि सामने वाला घर नागर का है
या फिर हंसते हुए बोलें कि मैं तो कवि हूं, संपादक-कवि सामने रहते हैं।
वैसे, दो कवि आमने सामने रहते हैं,
इसमें कोई काव्यात्मक संभावना दिल्ली की बहुत सारी कालोनियों में एक साथ रहते बुद्धिजीवियों, कवियों और कथाकारों को एक बेतुकी सी चीज लग सकती है,
मेरी तरह के सामान्य पाठक को फिर भी यह तथ्य लुभाता है-
इस बात से बेखबर कि दोनों कवियों में कौन बड़ा या वरिष्ठ है,
इस बात से बेपरवाह कि कई आलोचक और पाठक- जिनमें शायद मैं भी शामिल हूं-
विष्णु नागर और विष्णु खरे में नाम और पड़ोस के साम्य के अलावा और कोई साम्य न देखते हों।
धीरे-धीरे मेरे भीतर यह सवाल भी उभरता है कि क्या यह कवि-पड़ोस आपस में बतियाता होगा, या अपनी पकाई सब्जियां एक-दूसरे तक पहुंचाता होगा या
चायपत्ती या चीनी घट जाने पर एक-दूसरे से मांगता होगा?
हालांकि अब के जमाने में यह रिवाज भी बीते जमाने की चीज हो चुका है
लेकिन संभावना की तरह तो यह अब भी शेष है
और मैं दोनों कवि पत्नियों से अपने नाकुछ परिचय से कहीं ज्यादा अपनी सहज बुद्धि से कल्पना या कामना करता हूं कि दोनों के बीच कवियों की तुलना में कहीं ज्यादा आत्मीयता होगी या साझा होगा।
मैं ये भी सोचता हूं कि जब यह सोसाइटी बन रही होगी तब आसपास रहने की संभावना क्या इन कवियों को करीब लाई होगी?
क्या तब अपना-अपना छिंदवाड़ा या शाजापुर पीछे छोड़ते हुए विस्थापन की कोई हल्की कचोट इनके भीतर रही होगी या ये इरादा कि एक दिन यमुना पार के इस मयूर विहार को छोड़कर वे अपने पुराने मुहल्लों और घरों में लौटेंगे?
या ये राहत कि दिल्ली में अब इनके सरों पर एक छत है जो ढलती हुई उम्र में इनका आसरा बनेगी?
या ये अफसोस कि अब उनके बच्चे इस बेगाने और बेवफा शहर को अपना घर मानेंगे, उन छूटे हुए शहरों के बदरंग होते घरों को नहीं, जिनमें उनका अपना बचपन कटा और जहां से वे इस लायक बने कि दिल्ली तक आ सके?
या ये कि ये दोनों विस्थापित कवि जब अपने घरों का बनना देख रहे होंगे तो ऐसे या इससे मिलते-जुलते कई अहसासों में आपस में साझा करते होंगे?
या फिर यह कि व्यक्तियों और पड़ोसियों के तौर पर कभी ये बेहद सहज और आत्मीय रहे लोग क्या कवि होने की महत्त्वाकांक्षा या एक ही संस्थान में नौकरी करने की मजबूरी में कभी एक-दूसरे से टकराए होंगे
और फिर धीरे-धीरे इतने दूर निकल आए होंगे कि आमने-सामने घर होने के बावजूद कभी साथ चाय न पीते हों?
या फिर यह कि आपसी समझ ने दोनों के बीच रिश्ता तो कायम रखा होगा जिसमें कभी कभार मिलने की औपचारिकता वे निबाह लेते होंगे
लेकिन पुरानी आत्मीयता शेष न हो?
बहरहाल, दो लोगों के बेहद निजी जीवन में घुसपैठ की यह कोशिश कई और सवालों को अलक्षित नहीं कर सकती।
मसलन, दिल्ली में किसी को क्या फर्क पड़ता है इस बात से कि कौन कहां रहता है.,
भले ही वह कविताएं लिखता हो और उसके संग्रह में कुछ ऐसी कविताएं हों जो अपनी मार्मिकता में जीवन को हमारे लिए कुछ ज्यादा सुंदर और संभावनापूर्ण बनाती हो
या फिर यह कि दो कवि सिर्फ दो कवि नहीं, व्यक्ति भी होते हैं और उनके जीवन में कविता के अलावा भी सरोकार होते हैं। और किसी बाहर वाले का इसके बारे में विचार करना जितना अशालीन है, लिखना उससे कहीं ज्यादा उद्धत प्रयत्न है।
या फिर यह कि समाज में कवि भले रहते हों, कविता की जगह कम हो गई है। शायरों की दिल्ली में टायर ज्यादा दिखने लगे हैं।
(हालांकि इस पंक्ति का वास्ता शरद जोशी के शायर-टायर वाले लेख से नहीं, जमाने की बदलती सच्चाई से है जिसमें कालोनियों में जितने लोग नहीं दिखते उससे ज्यादा गाड़ियां दिखती हैं।)
या फिर यह कि कवि पड़ोस में रहें या सैकड़ों मील दूर- वे एक-दूसरे के करीब होते हैं। तब भी जब एक दूसरे की प्रतिभा या प्रसिद्धि या रचना से जलते हैं। लेकिन यह जलना भी शायद कहीं बेहतर कविता लिखने की इच्छा का नतीजा होता है।
या फिर यह कि वक्त इतना बदल गया है कि बस्तियों में रह कर भी हम अपने-अपने उजाड़ों में रहने को अभिशप्त हैं। कालोनियों में हम चौकीदारों की ज्यादा परवाह करते हैं कवियों की नहीं।
वैसे उदास करने वाले खयाल और भी हैं, उदास करने वाली सच्चाइयां भी।
जैसे अब संवाद नहीं है, सब्र नहीं है
समय और भी नहीं है- अपनी-अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के बीहड़ में लहूलुहान पांव और दिमाग़ों में धंसे कांटे निकालने के लिए भी नहीं।
पीछे मुड़कर देखने के लिए भी नहीं, किसी का हाथ थामने, किसी की बात सुनने के लिए भी नहीं।
ऐसे सुनसान में क्यों मैं पड़ोस में रह रहे दो कवियों के बहाने अपनी तरह की एक दुनिया की कल्पना करने में लीन हूं?
इस अरक्षित समय में जो जहां हो, अच्छे से रहे, हम बस इतनी ही कामना कर सकते हैं।
दो कवि अच्छी कविताएं लिखते रहें, अच्छे पड़ोसी बने रहें और कोई गलती से सामने वाले की घंटी बजा दें तो उससे बैठकर दो मिनट बात भी कर लें।
बहुत मुमकिन हैं
आप एक की उम्मीद कर रहे हों
और दूसरा निकल आए
आखिर दोनों बिल्कुल आमने-सामने रहते हैं
और ऐसी चूक तो हो सकती है कि सोसाइटी के दरबान के समझाने के बावजूद
आप ठीक से समझ न पाएं कि बाएं वाला या दाएं वाला फ्लैट विष्णु नागर का है
और आप विष्णु खरे के घर की घंटी बजा दें।
यह जानकर कि नागर से मिलने की कोशिश में आप खरे के घर चले आए हैं,
विष्णु जी की प्रतिक्रिया क्या होगी, ये मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता
क्योंकि उनकी प्रतिभा, विदग्धता और उनके वाक चातुर्य का लोहा सब मानते हैं
और मैं भी कायल रहा हूं उनकी प्रखर टिप्पणियों, उनकी उनसे भी प्रखर कविताओं का-
आप ध्यान देंगे कि मैं इस कविता में भी उनकी शैली की नकल करने की कितनी नाकाम सी कोशिश कर रहा हूं।
बहरहाल, मैं आपकी जगह होऊं तो शायद विष्णु जी की डांट सुनकर भी पुलकित हो जाऊं कि देखो हिंदी के दो कवि बिल्कुल आमने सामने रहते हैं।
यह पुलक इस बात से कम नहीं होगी, शायद कुछ बढ ही जाए कि
विष्णु जी डांटें नहीं, सीधे बता दें कि सामने वाला घर नागर का है
या फिर हंसते हुए बोलें कि मैं तो कवि हूं, संपादक-कवि सामने रहते हैं।
वैसे, दो कवि आमने सामने रहते हैं,
इसमें कोई काव्यात्मक संभावना दिल्ली की बहुत सारी कालोनियों में एक साथ रहते बुद्धिजीवियों, कवियों और कथाकारों को एक बेतुकी सी चीज लग सकती है,
मेरी तरह के सामान्य पाठक को फिर भी यह तथ्य लुभाता है-
इस बात से बेखबर कि दोनों कवियों में कौन बड़ा या वरिष्ठ है,
इस बात से बेपरवाह कि कई आलोचक और पाठक- जिनमें शायद मैं भी शामिल हूं-
विष्णु नागर और विष्णु खरे में नाम और पड़ोस के साम्य के अलावा और कोई साम्य न देखते हों।
धीरे-धीरे मेरे भीतर यह सवाल भी उभरता है कि क्या यह कवि-पड़ोस आपस में बतियाता होगा, या अपनी पकाई सब्जियां एक-दूसरे तक पहुंचाता होगा या
चायपत्ती या चीनी घट जाने पर एक-दूसरे से मांगता होगा?
हालांकि अब के जमाने में यह रिवाज भी बीते जमाने की चीज हो चुका है
लेकिन संभावना की तरह तो यह अब भी शेष है
और मैं दोनों कवि पत्नियों से अपने नाकुछ परिचय से कहीं ज्यादा अपनी सहज बुद्धि से कल्पना या कामना करता हूं कि दोनों के बीच कवियों की तुलना में कहीं ज्यादा आत्मीयता होगी या साझा होगा।
मैं ये भी सोचता हूं कि जब यह सोसाइटी बन रही होगी तब आसपास रहने की संभावना क्या इन कवियों को करीब लाई होगी?
क्या तब अपना-अपना छिंदवाड़ा या शाजापुर पीछे छोड़ते हुए विस्थापन की कोई हल्की कचोट इनके भीतर रही होगी या ये इरादा कि एक दिन यमुना पार के इस मयूर विहार को छोड़कर वे अपने पुराने मुहल्लों और घरों में लौटेंगे?
या ये राहत कि दिल्ली में अब इनके सरों पर एक छत है जो ढलती हुई उम्र में इनका आसरा बनेगी?
या ये अफसोस कि अब उनके बच्चे इस बेगाने और बेवफा शहर को अपना घर मानेंगे, उन छूटे हुए शहरों के बदरंग होते घरों को नहीं, जिनमें उनका अपना बचपन कटा और जहां से वे इस लायक बने कि दिल्ली तक आ सके?
या ये कि ये दोनों विस्थापित कवि जब अपने घरों का बनना देख रहे होंगे तो ऐसे या इससे मिलते-जुलते कई अहसासों में आपस में साझा करते होंगे?
या फिर यह कि व्यक्तियों और पड़ोसियों के तौर पर कभी ये बेहद सहज और आत्मीय रहे लोग क्या कवि होने की महत्त्वाकांक्षा या एक ही संस्थान में नौकरी करने की मजबूरी में कभी एक-दूसरे से टकराए होंगे
और फिर धीरे-धीरे इतने दूर निकल आए होंगे कि आमने-सामने घर होने के बावजूद कभी साथ चाय न पीते हों?
या फिर यह कि आपसी समझ ने दोनों के बीच रिश्ता तो कायम रखा होगा जिसमें कभी कभार मिलने की औपचारिकता वे निबाह लेते होंगे
लेकिन पुरानी आत्मीयता शेष न हो?
बहरहाल, दो लोगों के बेहद निजी जीवन में घुसपैठ की यह कोशिश कई और सवालों को अलक्षित नहीं कर सकती।
मसलन, दिल्ली में किसी को क्या फर्क पड़ता है इस बात से कि कौन कहां रहता है.,
भले ही वह कविताएं लिखता हो और उसके संग्रह में कुछ ऐसी कविताएं हों जो अपनी मार्मिकता में जीवन को हमारे लिए कुछ ज्यादा सुंदर और संभावनापूर्ण बनाती हो
या फिर यह कि दो कवि सिर्फ दो कवि नहीं, व्यक्ति भी होते हैं और उनके जीवन में कविता के अलावा भी सरोकार होते हैं। और किसी बाहर वाले का इसके बारे में विचार करना जितना अशालीन है, लिखना उससे कहीं ज्यादा उद्धत प्रयत्न है।
या फिर यह कि समाज में कवि भले रहते हों, कविता की जगह कम हो गई है। शायरों की दिल्ली में टायर ज्यादा दिखने लगे हैं।
(हालांकि इस पंक्ति का वास्ता शरद जोशी के शायर-टायर वाले लेख से नहीं, जमाने की बदलती सच्चाई से है जिसमें कालोनियों में जितने लोग नहीं दिखते उससे ज्यादा गाड़ियां दिखती हैं।)
या फिर यह कि कवि पड़ोस में रहें या सैकड़ों मील दूर- वे एक-दूसरे के करीब होते हैं। तब भी जब एक दूसरे की प्रतिभा या प्रसिद्धि या रचना से जलते हैं। लेकिन यह जलना भी शायद कहीं बेहतर कविता लिखने की इच्छा का नतीजा होता है।
या फिर यह कि वक्त इतना बदल गया है कि बस्तियों में रह कर भी हम अपने-अपने उजाड़ों में रहने को अभिशप्त हैं। कालोनियों में हम चौकीदारों की ज्यादा परवाह करते हैं कवियों की नहीं।
वैसे उदास करने वाले खयाल और भी हैं, उदास करने वाली सच्चाइयां भी।
जैसे अब संवाद नहीं है, सब्र नहीं है
समय और भी नहीं है- अपनी-अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के बीहड़ में लहूलुहान पांव और दिमाग़ों में धंसे कांटे निकालने के लिए भी नहीं।
पीछे मुड़कर देखने के लिए भी नहीं, किसी का हाथ थामने, किसी की बात सुनने के लिए भी नहीं।
ऐसे सुनसान में क्यों मैं पड़ोस में रह रहे दो कवियों के बहाने अपनी तरह की एक दुनिया की कल्पना करने में लीन हूं?
इस अरक्षित समय में जो जहां हो, अच्छे से रहे, हम बस इतनी ही कामना कर सकते हैं।
दो कवि अच्छी कविताएं लिखते रहें, अच्छे पड़ोसी बने रहें और कोई गलती से सामने वाले की घंटी बजा दें तो उससे बैठकर दो मिनट बात भी कर लें।
Wednesday, December 12, 2007
जीने के साधन
बढ़ते जा रहे हैं जीने के साधऩ
सिकुड़ती जा रही है जीने की जगह
सांस भी लो तो हवा का वजन महसूस होता है
पानी गले से नीचे उतरता है जेब पर भारी पड़ता है
अनगिनत आवाज़ें हैं
लेकिन सुनाई बहुत कम पड़ता है
और उससे भी कम समझ में आता है
रोशनी बहुत है लेकिन दूर तक देखना मुश्किल
बिल्कुल अंधेरा समय इस धरती से जैसे उठता जा रहा है
और इसी के साथ गुम हुई जा रही है
काले आसमान में बिछी सितारों की झिलमिल चादर
हालांकि रोज़ खोजे जा रहे हैं नए ग्रह-उपग्रह, चांद और नक्षत्र
आकाश के किसी अदृश्य अछोर में
दो विराट आकाशगंगाओं का नृत्य इंसान की सबसे बडी दूरबीन
का सबसे दिलकश नजारा है
जिसमें झरते हैं लाखों सितारों के चूरे
लेकिन इनका एक भी कण धरती के करीब नहीं फटकता
वह इंसान और सामान से भरी एक ऐसी उदास जगह
में बदलती जा रही है
जहां बेआवाज टहलती हैं अकेली इच्छाएं
जो बहुत सारी खरीददारी के बीच, बहुत सारे रुपए खर्च कर देने के बावजूद
और बहुत सारे साधन जुटा लेने की कामयाबी पर भी
अधूरी रह जाती हैं
दिन कामनाओं और कामयाबी की एक न खत्म होने वाली सड़क पर भागते गुजरता है
शामें इस रफ़्तार में कब कुचल दी जाती हैं, पता भी नहीं चलता
और
रात को उनींदी थकी आंखें
सपनों के धूसर बिंबों के बीच आने वाले दिनों के डरों का सामना करती हैं
और घबरा कर जाग जाती हैं
कि एक और सुबह उनके सामने सवाल की तरह खड़ी है।
सिकुड़ती जा रही है जीने की जगह
सांस भी लो तो हवा का वजन महसूस होता है
पानी गले से नीचे उतरता है जेब पर भारी पड़ता है
अनगिनत आवाज़ें हैं
लेकिन सुनाई बहुत कम पड़ता है
और उससे भी कम समझ में आता है
रोशनी बहुत है लेकिन दूर तक देखना मुश्किल
बिल्कुल अंधेरा समय इस धरती से जैसे उठता जा रहा है
और इसी के साथ गुम हुई जा रही है
काले आसमान में बिछी सितारों की झिलमिल चादर
हालांकि रोज़ खोजे जा रहे हैं नए ग्रह-उपग्रह, चांद और नक्षत्र
आकाश के किसी अदृश्य अछोर में
दो विराट आकाशगंगाओं का नृत्य इंसान की सबसे बडी दूरबीन
का सबसे दिलकश नजारा है
जिसमें झरते हैं लाखों सितारों के चूरे
लेकिन इनका एक भी कण धरती के करीब नहीं फटकता
वह इंसान और सामान से भरी एक ऐसी उदास जगह
में बदलती जा रही है
जहां बेआवाज टहलती हैं अकेली इच्छाएं
जो बहुत सारी खरीददारी के बीच, बहुत सारे रुपए खर्च कर देने के बावजूद
और बहुत सारे साधन जुटा लेने की कामयाबी पर भी
अधूरी रह जाती हैं
दिन कामनाओं और कामयाबी की एक न खत्म होने वाली सड़क पर भागते गुजरता है
शामें इस रफ़्तार में कब कुचल दी जाती हैं, पता भी नहीं चलता
और
रात को उनींदी थकी आंखें
सपनों के धूसर बिंबों के बीच आने वाले दिनों के डरों का सामना करती हैं
और घबरा कर जाग जाती हैं
कि एक और सुबह उनके सामने सवाल की तरह खड़ी है।
Sunday, December 9, 2007
तोड़ना और बनाना
बनाने में कुछ जाता है
नष्ट करने में नहीं
बनाने में मेहनत लगती है. बुद्धि लगती है, वक्त लगता है
तो़ड़ने में बस थोड़ी सी ताकत
और थोड़े से मंसूबे लगते हैं।
इसके बावजूद बनाने वाले तोड़ने वालों पर भारी पड़ते हैं
वे बनाते हुए जितना हांफते नहीं,
उससे कहीं ज्यादा तोड़ने वाले हांफते हैं।
कभी किसी बनाने वाले के चेहरे पर थकान नहीं दिखती
पसीना दिखता है, लेकिन मुस्कुराता हुआ,
खरोंच दिखती है, लेकिन बदन को सुंदर बनाती है।
लेकिन कभी किसी तोड़ने वाले का चेहरा
आपने ध्यान से देखा है?
वह एक हांफता, पसीने से तर-बतर बदहवास चेहरा होता है
जिसमें सारी दुनिया से जितनी नफरत भरी होती है,
उससे कहीं ज्यादा अपने आप से।
असल में तोड़ने वालों को पता नहीं चलता
कि वे सबसे पहले अपने-आप को तोड़ते हैं
जबकि बनाने वाले कुछ बनाने से पहले अपने-आप को बनाते हैं।
दरअसल यही वजह है कि बनाने का मुश्किल काम चलता रहता है
तोड़ने का आसान काम दम तोड़ देता है।
तोड़ने वालों ने बहुत सारी मूर्तियां तोड़ीं, जलाने वालों ने बहुत सारी किताबें जलाईं
लेकिन बुद्ध फिर भी बचे रहे, ईसा का सलीब बचा रहा, कालिदार और होमर बचे रहे।
अगर तोड़ दी गई चीजों की सूची बनाएं तो बहुत लंबी निकलती है
दिल से आह निकलती है कि कितनी सारी चीजें खत्म होती चली गईं-
कितने सारे पुस्तकालय जल गए, कितनी सारी इमारतें ध्वस्त हो गईं,
कितनी सारी सभ्यताएं नष्ट कर दी गईं, कितने सारे मूल्य विस्मृत हो गए
लेकिन इस हताशा से बड़ी है यह सच्चाई
कि फिर भी चीजें बची रहीं
बनाने वालों के हाथ लगातार रचते रहे कुछ न कुछ
नई इमारतें, नई सभ्यताएं, नए बुत, नए सलीब, नई कविताएं
और दुनिया में टूटी हुई चीजों को फिर से बनाने का सिलसिला।
ये दुनिया जैसी भी हो, इसमें जितने भी तोड़ने वाले हों,
इसे बनाने वाले बार-बार बनाते रहेंगे
और बार-बार बताते रहेंगे
कि तोड़ना चाहे जितना भी आसान हो, फिर भी बनाने की कोशिश के आगे हार जाता है।
नष्ट करने में नहीं
बनाने में मेहनत लगती है. बुद्धि लगती है, वक्त लगता है
तो़ड़ने में बस थोड़ी सी ताकत
और थोड़े से मंसूबे लगते हैं।
इसके बावजूद बनाने वाले तोड़ने वालों पर भारी पड़ते हैं
वे बनाते हुए जितना हांफते नहीं,
उससे कहीं ज्यादा तोड़ने वाले हांफते हैं।
कभी किसी बनाने वाले के चेहरे पर थकान नहीं दिखती
पसीना दिखता है, लेकिन मुस्कुराता हुआ,
खरोंच दिखती है, लेकिन बदन को सुंदर बनाती है।
लेकिन कभी किसी तोड़ने वाले का चेहरा
आपने ध्यान से देखा है?
वह एक हांफता, पसीने से तर-बतर बदहवास चेहरा होता है
जिसमें सारी दुनिया से जितनी नफरत भरी होती है,
उससे कहीं ज्यादा अपने आप से।
असल में तोड़ने वालों को पता नहीं चलता
कि वे सबसे पहले अपने-आप को तोड़ते हैं
जबकि बनाने वाले कुछ बनाने से पहले अपने-आप को बनाते हैं।
दरअसल यही वजह है कि बनाने का मुश्किल काम चलता रहता है
तोड़ने का आसान काम दम तोड़ देता है।
तोड़ने वालों ने बहुत सारी मूर्तियां तोड़ीं, जलाने वालों ने बहुत सारी किताबें जलाईं
लेकिन बुद्ध फिर भी बचे रहे, ईसा का सलीब बचा रहा, कालिदार और होमर बचे रहे।
अगर तोड़ दी गई चीजों की सूची बनाएं तो बहुत लंबी निकलती है
दिल से आह निकलती है कि कितनी सारी चीजें खत्म होती चली गईं-
कितने सारे पुस्तकालय जल गए, कितनी सारी इमारतें ध्वस्त हो गईं,
कितनी सारी सभ्यताएं नष्ट कर दी गईं, कितने सारे मूल्य विस्मृत हो गए
लेकिन इस हताशा से बड़ी है यह सच्चाई
कि फिर भी चीजें बची रहीं
बनाने वालों के हाथ लगातार रचते रहे कुछ न कुछ
नई इमारतें, नई सभ्यताएं, नए बुत, नए सलीब, नई कविताएं
और दुनिया में टूटी हुई चीजों को फिर से बनाने का सिलसिला।
ये दुनिया जैसी भी हो, इसमें जितने भी तोड़ने वाले हों,
इसे बनाने वाले बार-बार बनाते रहेंगे
और बार-बार बताते रहेंगे
कि तोड़ना चाहे जितना भी आसान हो, फिर भी बनाने की कोशिश के आगे हार जाता है।
Thursday, November 29, 2007
कविता की जगह
सच है कि अकेली कविता बहुत कुछ नहीं कर सकती
हमारे समय में लड़ाइयों के जितने मोर्चे खुले हुए हैं
और वार करने की जितनी नई तरकीबें लोगो के पास हैं
खुद को बचाने के जितने सारे कवच-
उन सबको देखते हुए कविता एक निरीह सी कोशिश जान पड़ती है
एक ऐसी कोशिश जिस पर बहुत सारे हंसते हैं
और जिसका बहुत सारे अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं।
कविता अब न किसी को डराती है
न किसी को जगाती है
वह न मिसाल बन सकती है न मशाल
ज्यादा से ज्यादा वह है एक ऐसा खयाल
जो आपको खुश करे तसल्ली दे
जिसे आप अपने बचे रहने की
तार-तार हो चुके सबूत की तरह देखें
यह भी सच है कि हमारा ज्यादातर समय कविता के बिना बीतता है
हमारी ज्यादातर लड़ाइयों में कविता काम नहीं आती
कई बार वह एक अनुपयोगी अनुषंग की तरह बची लगती है
जो डार्विन के विकासवाद के मुताबिक
सिकुड़ती-छीजती जा रही है
यह कह देना अहसास से कहीं ज्यादा चलन का मामला है
कि इसके बावजूद वह बची रहेगी
देती रहेगी दस्तक हमारी अंतरात्मा के बंद दरवाज़ों पर
कि किसी फुसफुसाहट की तरह नई हवाओ में भी हमें पुराने दिनों की याद दिलाती रहेगी
हमें हमसे मिलाती रहेगी
लेकिन सच्चाई यह है कि धीरे-धीरे जैसे ईश्वर की, वैसे ही कविता की भी
जगह घटती ही जा रही है जीवन में
ईश्वर से पैदा हुआ शून्य कविता भरती है
कविता से पैदा हुआ शून्य कौन भरेगा?
क्या कविता नहीं रहेगी तो
हमारा होना एक ब्लैकहोल में, किसी बुझे हुए सितारे की राख की तरह बचा रहेगा?
इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं, आपके पास हो तो हो
फिलहाल तो मैं बस इतना चाहता हूं कि मैं बना रहूं
और मुझमें मेरी कविताएं बनी रहें।
हमारे समय में लड़ाइयों के जितने मोर्चे खुले हुए हैं
और वार करने की जितनी नई तरकीबें लोगो के पास हैं
खुद को बचाने के जितने सारे कवच-
उन सबको देखते हुए कविता एक निरीह सी कोशिश जान पड़ती है
एक ऐसी कोशिश जिस पर बहुत सारे हंसते हैं
और जिसका बहुत सारे अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं।
कविता अब न किसी को डराती है
न किसी को जगाती है
वह न मिसाल बन सकती है न मशाल
ज्यादा से ज्यादा वह है एक ऐसा खयाल
जो आपको खुश करे तसल्ली दे
जिसे आप अपने बचे रहने की
तार-तार हो चुके सबूत की तरह देखें
यह भी सच है कि हमारा ज्यादातर समय कविता के बिना बीतता है
हमारी ज्यादातर लड़ाइयों में कविता काम नहीं आती
कई बार वह एक अनुपयोगी अनुषंग की तरह बची लगती है
जो डार्विन के विकासवाद के मुताबिक
सिकुड़ती-छीजती जा रही है
यह कह देना अहसास से कहीं ज्यादा चलन का मामला है
कि इसके बावजूद वह बची रहेगी
देती रहेगी दस्तक हमारी अंतरात्मा के बंद दरवाज़ों पर
कि किसी फुसफुसाहट की तरह नई हवाओ में भी हमें पुराने दिनों की याद दिलाती रहेगी
हमें हमसे मिलाती रहेगी
लेकिन सच्चाई यह है कि धीरे-धीरे जैसे ईश्वर की, वैसे ही कविता की भी
जगह घटती ही जा रही है जीवन में
ईश्वर से पैदा हुआ शून्य कविता भरती है
कविता से पैदा हुआ शून्य कौन भरेगा?
क्या कविता नहीं रहेगी तो
हमारा होना एक ब्लैकहोल में, किसी बुझे हुए सितारे की राख की तरह बचा रहेगा?
इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं, आपके पास हो तो हो
फिलहाल तो मैं बस इतना चाहता हूं कि मैं बना रहूं
और मुझमें मेरी कविताएं बनी रहें।
Wednesday, November 28, 2007
आग
अपने लिखने पर बहुत भरोसा रहा हमें
एक भोला भरोसा
जो एक कमजोर सी कलम के बूते देखता रहा दुनिया बदलने का सपना
जबकि दुनिया हमें बदलती रही
उसने हमारे लिए कलमें बनाईं
उनका मोल लगाया
उसने हमारी आग को अपनी धमन भट्ठियों के लिए इस्तेमाल किया
उसने हमारे हुनर से अपने घर सजाए
उसने हमारे ऊपर सुविधाओं का पानी डाला
हम पहले धुआं हुए, कुछ की आंखों में गड़े
फिर राख हुए
समाधिलेख की सामग्री बने
वैसे हमें बुझाने के और भी आसान तरीके सामने आ गए
लोगों ने पहले हमारा जादू देखा
फिर इस जादू का बिखरना देखा
हम बंद हो गए एक माचिस की डिबिया में
हम छोटी-छोटी तीलियों में बदल गए
बस इतने से आश्वस्त और खुश
कि हमारे भीतर बची हुई है आग
कि थोड़ी सी रगड़ से वह दिखा सकती है अपना कमाल
कि अब भी उसमें कहीं भी जल उठने, कुछ भी जला देने की क्षमता है
लेकिन माचिस की डिब्बी में बंद ये तीलियां
यह तक नहीं देख पाईं
कि वे किन पाकशालाओं, किन जेबों के हवाले हैं
और
किनका चूल्हा चलाने, किनकी सिगरेट जलाने में
उनका इस्तेमाल हो रहा है।
हम आग थे, हममें जलने की संभावनाएं थीं
हममें बदलने की संभावनाएं थीं
लेकिन हमने हवाओं से मुंह छुपाया
दिशाओं से पाला बदला
कुछ भी देखने से इनकार किया
ये भी नहीं देखा
जिसे हमें मशाल समझते रहे
वह तीली-तीली सिमटती गई
बडी उपमाओं के नीचे बनते रहे छोटे-छोटे यथार्थ
ध्यान से देखें तो जिनमें दिखेगी एक अट्टाहासी कामयाबी
आग को जीतकर ही इंसान ने सभ्यता बनाई
आग को गुलाम रखकर ही वह अपनी इस सभ्यता को बचा रहा है।
एक भोला भरोसा
जो एक कमजोर सी कलम के बूते देखता रहा दुनिया बदलने का सपना
जबकि दुनिया हमें बदलती रही
उसने हमारे लिए कलमें बनाईं
उनका मोल लगाया
उसने हमारी आग को अपनी धमन भट्ठियों के लिए इस्तेमाल किया
उसने हमारे हुनर से अपने घर सजाए
उसने हमारे ऊपर सुविधाओं का पानी डाला
हम पहले धुआं हुए, कुछ की आंखों में गड़े
फिर राख हुए
समाधिलेख की सामग्री बने
वैसे हमें बुझाने के और भी आसान तरीके सामने आ गए
लोगों ने पहले हमारा जादू देखा
फिर इस जादू का बिखरना देखा
हम बंद हो गए एक माचिस की डिबिया में
हम छोटी-छोटी तीलियों में बदल गए
बस इतने से आश्वस्त और खुश
कि हमारे भीतर बची हुई है आग
कि थोड़ी सी रगड़ से वह दिखा सकती है अपना कमाल
कि अब भी उसमें कहीं भी जल उठने, कुछ भी जला देने की क्षमता है
लेकिन माचिस की डिब्बी में बंद ये तीलियां
यह तक नहीं देख पाईं
कि वे किन पाकशालाओं, किन जेबों के हवाले हैं
और
किनका चूल्हा चलाने, किनकी सिगरेट जलाने में
उनका इस्तेमाल हो रहा है।
हम आग थे, हममें जलने की संभावनाएं थीं
हममें बदलने की संभावनाएं थीं
लेकिन हमने हवाओं से मुंह छुपाया
दिशाओं से पाला बदला
कुछ भी देखने से इनकार किया
ये भी नहीं देखा
जिसे हमें मशाल समझते रहे
वह तीली-तीली सिमटती गई
बडी उपमाओं के नीचे बनते रहे छोटे-छोटे यथार्थ
ध्यान से देखें तो जिनमें दिखेगी एक अट्टाहासी कामयाबी
आग को जीतकर ही इंसान ने सभ्यता बनाई
आग को गुलाम रखकर ही वह अपनी इस सभ्यता को बचा रहा है।
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